भक्तिदान गुरू दीजिए, देवन के देवा। चरण ​कमल बिसरौं नहीं, करिहौं पद सेवा। तीरथ व्रत मैं ना करूं, नहिं देवन पूजा। तू ही ओर निरखत रहूं, कोई और ...

भक्तिदान

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भक्तिदान गुरू दीजिए, देवन के देवा।
चरण ​कमल बिसरौं नहीं, करिहौं पद सेवा।
तीरथ व्रत मैं ना करूं, नहिं देवन पूजा।
तू ही ओर निरखत रहूं, कोई और न दूजा।।
सुख संपति परिवार धन, सुंदर वर—नारी।
सपनेहूं इच्छा ना उठे, रहे ध्यान तुम्हारी।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि है, बैकुंठ विलासा।
सो सब कछु नहिं चाहिए, मेरे समरथ दाता।।
धर्मदास की विनती, साहब सुनि लीजै।
दरशन दीजै पट खोलि के, आपन करि लीजै।।

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