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कबिरा गर्व न कीजिए, कबहुँ न हंसिए कोई। अजय नाव समुद्र में, का जाने का होई।। कबिरा सं​गति साधू की, नित प्रति कीजै जाय। दुर्मति दूर बहावसी, दे...

कबीर वाणी

कबीर वाणी

संत वाणी

8 10 99



कबिरा गर्व न कीजिए, कबहुँ न हंसिए कोई।
अजय नाव समुद्र में, का जाने का होई।।

कबिरा सं​गति साधू की, नित प्रति कीजै जाय।

दुर्मति दूर बहावसी, देसी सुमति दृढ़ाय।।




ई माया रघुनाथ की बौरी, खेलन चली अहेरा हो। चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारे, कोई न राखेउ नेरा हो।। मौनी  बीर दिगंबर मारे, ध्यान धरंते जोगी हो। जंग...

माया

माया

संत वाणी

8 10 99
ई माया रघुनाथ की बौरी, खेलन चली अहेरा हो।
चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारे, कोई न राखेउ नेरा हो।।
मौनी  बीर दिगंबर मारे, ध्यान धरंते जोगी हो।
जंगल में के जंगम मारे, माया किनहु न भोगी हो।।
बेद पढंते, बेदुआ मारे, पूजा करते स्वामी हो।
अर्थ बिचारत पंडित मारे, बाँधेउ सकल लगामी हो।।
शृंगी ऋषि बन भीतर मारे, शिर ब्रह्मा का फोरी हो।
नाथ मछंदर चले पीठि दे, सिंगलहू में बोरी हो।।
साकट के घर करता धरता, हरि भगता की चेरी हो।
कहँहि कबीर सुनो हो संतो, ज्यों आवै त्यौं फेरी हो।।

अवधू भूले को घर लावै, सो जन हमको भावै। घर में जोग भोग घर ही में, घर ​तजि बन नहिं जावै।। बन के गए कल्पना उपजै, तब धों कहाँ समावै। घर में भुक्...

अवधू भूले को घर लावै

अवधू भूले को घर लावै

संत वाणी

8 10 99
अवधू भूले को घर लावै, सो जन हमको भावै।
घर में जोग भोग घर ही में, घर ​तजि बन नहिं जावै।।
बन के गए कल्पना उपजै, तब धों कहाँ समावै।
घर में भुक्ति मुक्ति घर ही में, जो गुरू अलख लखावै।।
सहज सुन्न में रहै समाना, सहज समाधि लगावै।
उनमुनि रहै ब्रह्म को चीन्है, परम तत्त को ध्यावै।।
सुरति निरत सो मेला करि कै, अनहद नाद बजावै।
घर में बस्तु बस्तु में घर है, घर ही बस्तु मिलावै।।
कहैं कबीर सुनो हो अवधू ज्यों का त्यों ठहरावै।।

संतो पांडे निपुण कसाई। बकरा मारि भैंसा पर धावै , दिल मँह दर्द न आई।। करि अस्नान तिलक दै बैठे , विधि से देवि पुजाई। आतम राम पलक में बिनसे , र...

कलि के विदूषक

कलि के विदूषक

संत वाणी

8 10 99

संतो पांडे निपुण कसाई।
बकरा मारि भैंसा पर धावै, दिल मँह दर्द न आई।।
करि अस्नान तिलक दै बैठे, विधि से देवि पुजाई।
आतम राम पलक में बिनसे, रूधिर की नदी बहाई।।
अति पुनीत ऊँचे कुल कहिये, सभा माँहि अधिकाई।
इनते दीक्षा सब कोई मांगै, हाँसि आवै मोहि भाई।।
पाप कटन को कथा सुनावै, कर्म करावै नीचा।
हम तो दोउ परस्पर देखा, गहे हाथ यम खींचा।।
गाय बंधे ते तूरूक कहिये, इनते वै क्या छोटे।
कहँहि कबीर सुनो भाई संतो, कलि मँह ब्राह्मण खोटे।।

निर्विकार निर्भय तू ही और सकल भय मांहि। सब पर तेरी साहिबी तुझ पर साहिब नाहि।। साहब से सब होत है बन्दा से कछु नाहि। राई से पर्वत करे पर्वत रा...

साहब

साहब

संत वाणी

8 10 99



निर्विकार निर्भय तू ही और सकल भय मांहि।
सब पर तेरी साहिबी तुझ पर साहिब नाहि।।

साहब से सब होत है बन्दा से कछु नाहि।
राई से पर्वत करे पर्वत राई माहि।।

साहब तुमहि दयालु हो, तुम लगि मेरी दौड़।
जैसे काग जहाज को, सूझे और न ठौर।।

मन लागा मेरे यार फकीरी में। जो सुख होत हैं राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में।। भला बुरा सबका सुनि लीजै, कर गुजरान गरीबी में। ​आखिर तो मन ख...

मन लागा मेरे यार फकीरी में

मन लागा मेरे यार फकीरी में

संत वाणी

8 10 99
मन लागा मेरे यार फकीरी में।
जो सुख होत हैं राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में।।
भला बुरा सबका सुनि लीजै, कर गुजरान गरीबी में।
​आखिर तो मन खाक मिलेगा, काहे रहे मगरूरी में।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहब मिले सबूरी में।

भक्तिदान गुरू दीजिए, देवन के देवा। चरण ​कमल बिसरौं नहीं, करिहौं पद सेवा। तीरथ व्रत मैं ना करूं, नहिं देवन पूजा। तू ही ओर निरखत रहूं, कोई और ...

भक्तिदान

भक्तिदान

संत वाणी

8 10 99

भक्तिदान गुरू दीजिए, देवन के देवा।
चरण ​कमल बिसरौं नहीं, करिहौं पद सेवा।
तीरथ व्रत मैं ना करूं, नहिं देवन पूजा।
तू ही ओर निरखत रहूं, कोई और न दूजा।।
सुख संपति परिवार धन, सुंदर वर—नारी।
सपनेहूं इच्छा ना उठे, रहे ध्यान तुम्हारी।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि है, बैकुंठ विलासा।
सो सब कछु नहिं चाहिए, मेरे समरथ दाता।।
धर्मदास की विनती, साहब सुनि लीजै।
दरशन दीजै पट खोलि के, आपन करि लीजै।।

मन रे हरि भजि, हरि भजि, हरि भजि भाई। जा दिन तेरो कोई नांहीं, ता दिन राम ​सहाई।। तन्त ना जानूं मंत ना जानूं, जानूं सुन्दर काया। मीर मलिक छत्र...

​हरि भजन

​हरि भजन

संत वाणी

8 10 99
मन रे हरि भजि, हरि भजि, हरि भजि भाई।
जा दिन तेरो कोई नांहीं, ता दिन राम ​सहाई।।
तन्त ना जानूं मंत ना जानूं, जानूं सुन्दर काया।
मीर मलिक छत्रपति राजा, ते भी खाये माया।।
वेद न जानूं भेद ना जानूं, जानूं एक ही रामा।
पंडित दिसि पछियारा कीन्हां, मुख कीन्हौं जित नामा।।
राजा अंबरिक कै कारणि, चक्र सुदर्शन जारै।
दास कबीर कौ ठाकुर एैसो, भगत की शरण ऊबारै।।

हमारे गुरू करूणा सिंधु कबीर। अशरण शरण करण मुद मंगल, हरण सकल भव भीर।। जीव उद्धारण कारण प्रगटे, जग में धारि शरीर। मीर वजीर देखि भय माने, फक्कड...

करूणा सिंधु कबीर

करूणा सिंधु कबीर

संत वाणी

8 10 99
हमारे गुरू करूणा सिंधु कबीर।
अशरण शरण करण मुद मंगल, हरण सकल भव भीर।।
जीव उद्धारण कारण प्रगटे, जग में धारि शरीर।
मीर वजीर देखि भय माने, फक्कड़ वेश फकीर।।
शाह सिकन्दर कसनी लीन्हा, करि बहु विधि तदवीर।
नहिं वश चले हारि तव चरणन, आई पड़े आखीर।।
वीर बघेला के सद्गुरू हैं, बिजली खाँ के पीर।
हिन्दु—मुसलमान दोउ की, तोरी भरम जंजीड़।।
धर्मदास कहें और कौन हैं, अस समरथ मति धीर।
मगहर सूखी नदी बहाए, आमी अमृत नीर।।
हमारे गुरू.........................

संतो राह दूनो हम दीठा। हिन्दू तुरूक हटा नहिं मानै, स्वाद सभन को मीठा।। हिन्दू व्रत एकादसी साधै, दूध सिंघारा सेती। अन्न को त्यागै मन को न हटक...

हिन्दू तुरूक की एक राह है

हिन्दू तुरूक की एक राह है

संत वाणी

8 10 99
संतो राह दूनो हम दीठा।
हिन्दू तुरूक हटा नहिं मानै, स्वाद सभन को मीठा।।
हिन्दू व्रत एकादसी साधै, दूध सिंघारा सेती।
अन्न को त्यागै मन को न हटकै, पारन करै सगौती।।
तुरूक रोजा नमाज गुजारै, बिस्मिल बांग पुकारै।
इनको भिस्त कहाँ ते होवै, सांझे मुर्गी मारै।।
हिन्दू की दया मेहर तुर्कन की, दोनों घट सौं त्यागी।
ये हलाल वै झटका मारै, आगि दूनो घर लागी।।
हिन्दू तुरूक की एक राह है, सतगुरू सोई लखाई।
कहहिं कबीर सुनो हो संतो, राम न कहेउ खुदाई।।