निर्विकार निर्भय तू ही और सकल भय मांहि। सब पर तेरी साहिबी तुझ पर साहिब नाहि।। साहब से सब होत है बन्दा से कछु नाहि। राई से पर्वत करे पर्वत रा...

साहब

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साहब

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निर्विकार निर्भय तू ही और सकल भय मांहि।
सब पर तेरी साहिबी तुझ पर साहिब नाहि।।

साहब से सब होत है बन्दा से कछु नाहि।
राई से पर्वत करे पर्वत राई माहि।।

साहब तुमहि दयालु हो, तुम लगि मेरी दौड़।
जैसे काग जहाज को, सूझे और न ठौर।।

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