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Saint Kabir Das says that there is no king on the universe as God . These are the kings of their sovereignty ...
King of Kabir हरि समान नहीं राजा
Saint Kabir Das says that there is no king on the universe as God. These are the kings of their sovereignty to a few days. King, he is the Almighty God, whose power is spread over three Bhuvan. Finally, the God is to be found in creatures whose rule is infinite.
संत कबीर दास कहते हैं कि इस धरती पर हरि के समान कोई राजा नहीं है। ये जो भी राजा हैं इनकी प्रभुता थोड़े दिनों की है। राजा तो वो सर्वशक्तिमान प्रभु है जिसकी सत्ता तीनों भुवन पर व्याप्त है । जीव को अंत में उस प्रभु में मिल जाना है जिसकी प्रभुता अनंत है।कोऊ हरि समान नहीं राजा ।ये भूपति सब दिवस चारि के झूठे करत दिवाजा ।।तेरा जनु होई सोइ कत डोलै तीन भुवन पर छाजा ।हाथु पसारि सकै को जन कउ बोलि सकै न अंदाजा ।।चेति अचेत मूढ़ मन मेरे बाजे अनहद बाजा ।कहि कबीर संसा भ्रम चूको ध्रूव प्रह्लाद निवाजा ।
गोविंदे तूं निरंजन तूं निरंजन तूं निरंजन राया ।तेरे रूप नाही रेख नाहीं मुदे नाही माया ।।समद नाहीं शिखर नाहीं, धरती नाहीं गगनां ...
Nature of God भगवान का स्वरूप
नाद नाहीं ब्यंद नाहीं, काल नाहीं काया ।जब तै जल व्यंब न होते, तब तूं हीं राम राया ।।जप नाहीं तप नाहीं, जोग ध्यान नहीं पूजा ।शिव नाहीं शक्ति नाहीं, देव नहीं दूजा ।।रूग न जुग न श्याम अथरबन, वेद नहीं व्याकरनां ।तेरी गति तू ही जानैं, कबीरा तेरी सरनां ।।
ना इहु मानसु ना इहु देउ । ना इहु जती कहावै सेउ ।।ना इहु जोगी ना अवधूता । ना इसु माइ न काहू पूता ।। इआ मंदर महि कौन बसाई । ता का अ...
जीव का स्वरूप Nature of Soul
ना इहु मानसु ना इहु देउ । ना इहु जती कहावै सेउ ।।ना इहु जोगी ना अवधूता । ना इसु माइ न काहू पूता ।।
इआ मंदर महि कौन बसाई । ता का अंतु न कोऊ पाई ।।ना इहु पिंडु न रकतू राती । ना ईहु ब्रहमनु न इहु खाती ।।ना इहु तपा कहावै सेखु । ना इहु जीबै न मरता देखु ।।इसु मरते कउ जे कोऊ रोवै । जो रोवै सोई पति खोवै ।।गुर प्रसाद मैं डगरो पाइआ । जीवन मरनु दोऊ मिटवाइआ ।।कहु कबीर इहु राम की अंसु । जस कागद पर मिटै न मंसु ।।
संतो देखत जग बौराना । साँच कहौं तो मारन धावै, झूठै जग पतियाना ।। नेमी देखा धर्मी देखा, प्रात करै असनाना । आतम मारि पषानहि पूजै, उनमें किछुउ ...
संतो देखत जग बौराना
संतो देखत जग बौराना ।
साँच कहौं तो मारन धावै, झूठै जग पतियाना ।।
नेमी देखा धर्मी देखा, प्रात करै असनाना ।
आतम मारि पषानहि पूजै, उनमें किछुउ न ज्ञाना ।।
बहुतक देखा पीर औलिया, पढ़े कितेब कुराना ।
कै मुरीद तदवीर बतावै, उनमें उहै जो ज्ञाना ।।
आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन मँह बहुत गुमाना ।
पीतर पाथर पूजन लागै, तीरथ गरब भुलाना ।।
टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना ।
साखी शब्दै गावत भूले, आतम खबरि न जाना ।।
हिेन्दू कहैं मोहि राम पियारा, तुरूक कहैं रहमाना ।
आपस में दोए लरि—लरि मूये, मर्म न काहू जाना ।।
घर—घर मंतर देत फिरतु हैं, महिमा के अभिमाना ।
गुरू सहित शिष्य सब बूड़े, अंत काल पछिताना ।।
कहँहि कबीर सुनो हो संतो, ई सब भर्म भुलाना ।
केतिक कहौं कहा नहि मानै, सहजै सहज समाना ।।
भाँग तम्बाकू धूतरा, आँफू और शराब। कौन करेगा बन्दगी, ये तो हुए खराब।। भाँग भखे बल बुद्धि को, आँफू अहमक होय। दो अमलन अवगुण कहा, ज्ञानवन्त नर ज...
नशा छाड़ि जीव भजन करहु
भाँग तम्बाकू धूतरा, आँफू और शराब।
कौन करेगा बन्दगी, ये तो हुए खराब।।
भाँग भखे बल बुद्धि को, आँफू अहमक होय।
दो अमलन अवगुण कहा, ज्ञानवन्त नर जोय।।
अवगुण कहूँ शराब का, सुनहु संत चित लाय।
मानुस ते पशुआ करे, द्रव्य गांठ का जाय।।
काम हरक्कत बल घटै, तृष्णा नाहीं ठौर।
ढिग होय बैठा दीन सा, एक चिलम भर और।।
पानी पृथ्वी के हते, धूआँ सुनके जीव।
हुक्का में हिंसा घनी, क्यों कर पीवे पीव।।
संतो धोखा कासूं कहिए। गुण में निर्गुण, निर्गु्ण में गुण बाट छाड़ि क्यों बहिए।। अजरा अमर कथे सब कोई अलख न कथिआ जाई। नाती बरन रूप नहीं वाके ...
हरि
कबिरा गर्व न कीजिए, कबहुँ न हंसिए कोई। अजय नाव समुद्र में, का जाने का होई।। कबिरा संगति साधू की, नित प्रति कीजै जाय। दुर्मति दूर बहावसी, दे...
कबीर वाणी
ई माया रघुनाथ की बौरी, खेलन चली अहेरा हो। चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारे, कोई न राखेउ नेरा हो।। मौनी बीर दिगंबर मारे, ध्यान धरंते जोगी हो। जंग...
माया
चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारे, कोई न राखेउ नेरा हो।।
मौनी बीर दिगंबर मारे, ध्यान धरंते जोगी हो।
जंगल में के जंगम मारे, माया किनहु न भोगी हो।।
बेद पढंते, बेदुआ मारे, पूजा करते स्वामी हो।
अर्थ बिचारत पंडित मारे, बाँधेउ सकल लगामी हो।।
शृंगी ऋषि बन भीतर मारे, शिर ब्रह्मा का फोरी हो।
नाथ मछंदर चले पीठि दे, सिंगलहू में बोरी हो।।
साकट के घर करता धरता, हरि भगता की चेरी हो।
कहँहि कबीर सुनो हो संतो, ज्यों आवै त्यौं फेरी हो।।
अवधू भूले को घर लावै, सो जन हमको भावै। घर में जोग भोग घर ही में, घर तजि बन नहिं जावै।। बन के गए कल्पना उपजै, तब धों कहाँ समावै। घर में भुक्...
अवधू भूले को घर लावै
घर में जोग भोग घर ही में, घर तजि बन नहिं जावै।।
बन के गए कल्पना उपजै, तब धों कहाँ समावै।
घर में भुक्ति मुक्ति घर ही में, जो गुरू अलख लखावै।।
सहज सुन्न में रहै समाना, सहज समाधि लगावै।
उनमुनि रहै ब्रह्म को चीन्है, परम तत्त को ध्यावै।।
सुरति निरत सो मेला करि कै, अनहद नाद बजावै।
घर में बस्तु बस्तु में घर है, घर ही बस्तु मिलावै।।
कहैं कबीर सुनो हो अवधू ज्यों का त्यों ठहरावै।।
संतो पांडे निपुण कसाई। बकरा मारि भैंसा पर धावै , दिल मँह दर्द न आई।। करि अस्नान तिलक दै बैठे , विधि से देवि पुजाई। आतम राम पलक में बिनसे , र...
कलि के विदूषक
निर्विकार निर्भय तू ही और सकल भय मांहि। सब पर तेरी साहिबी तुझ पर साहिब नाहि।। साहब से सब होत है बन्दा से कछु नाहि। राई से पर्वत करे पर्वत रा...
साहब
मन लागा मेरे यार फकीरी में। जो सुख होत हैं राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में।। भला बुरा सबका सुनि लीजै, कर गुजरान गरीबी में। आखिर तो मन ख...
मन लागा मेरे यार फकीरी में
भक्तिदान गुरू दीजिए, देवन के देवा। चरण कमल बिसरौं नहीं, करिहौं पद सेवा। तीरथ व्रत मैं ना करूं, नहिं देवन पूजा। तू ही ओर निरखत रहूं, कोई और ...
भक्तिदान
भक्तिदान गुरू दीजिए, देवन के देवा।
चरण कमल बिसरौं नहीं, करिहौं पद सेवा।
तीरथ व्रत मैं ना करूं, नहिं देवन पूजा।
तू ही ओर निरखत रहूं, कोई और न दूजा।।
सुख संपति परिवार धन, सुंदर वर—नारी।
सपनेहूं इच्छा ना उठे, रहे ध्यान तुम्हारी।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि है, बैकुंठ विलासा।
सो सब कछु नहिं चाहिए, मेरे समरथ दाता।।
धर्मदास की विनती, साहब सुनि लीजै।
दरशन दीजै पट खोलि के, आपन करि लीजै।।
अपने अवसान की ओर अग्रसर यह वर्ष अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है। भारत को एक बार पुन: विश्व कप का स्वाद चखाने वाली है यह वर्ष। अनेक घो...
नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं
मन रे हरि भजि, हरि भजि, हरि भजि भाई। जा दिन तेरो कोई नांहीं, ता दिन राम सहाई।। तन्त ना जानूं मंत ना जानूं, जानूं सुन्दर काया। मीर मलिक छत्र...
हरि भजन
जा दिन तेरो कोई नांहीं, ता दिन राम सहाई।।
तन्त ना जानूं मंत ना जानूं, जानूं सुन्दर काया।
मीर मलिक छत्रपति राजा, ते भी खाये माया।।
वेद न जानूं भेद ना जानूं, जानूं एक ही रामा।
पंडित दिसि पछियारा कीन्हां, मुख कीन्हौं जित नामा।।
राजा अंबरिक कै कारणि, चक्र सुदर्शन जारै।
दास कबीर कौ ठाकुर एैसो, भगत की शरण ऊबारै।।
















